Saturday, 31 May 2014

शायद

दो  मुट्ठी आसमान भी है,
थोड़ी सी ज़मीन भी है,
फिर भी सभी को,
संगेमरमर की चाह सी है !

शरीर से जुड़े छोटे से पंख भी हैं,
उड़ने की शायद क्षमता भी है,
फिर भी लंबी उड़ान के लिए,
साहस की अभी कमी सी है !

रोज़ वहीं जाना , रोज़ वहीं से आना !
इस रास्ते के तो अब पत्थर
भी पहचाने से लगते हैं !
कहीं किसी अलग जगह  जाना तो है,
बस मन बनाने की देर है !

रंग और भी होते,
संग और भी होते,
दोस्त और भी हो सकते हैं,
बस दिल मिलाने की देर है !

हम भी कुछ कर गुज़र जाएँ,
कुछ बड़ा शायद, सबसे अलग !
ये सोचते हो उमर भर तुम,
पर शायद एक शुरूवात की देर है !
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