Friday, 27 June 2014

नींम का पेड़

नींम का वो छोटा सा पेड़,
उग रहा था आँगन में !
उस में ना सुंदर फूल थे,
ना कड़वी मीठी  निम्बोरियाँ !
थे तो बस कुछ कड़वे पत्ते,
और भूरी सी शाखायें !

माँ ने कहा इसे काट देते हैं,
इस का क्या काम है ? इस ने बड़ा होना है,
और घर की दीवारों को करना है कमज़ोर !
पर कुछ था, जो उस पेड़ से डोर से जुड़ी थी !
मैने कभी उस से दान्तून बनाया,
और  कभी पत्तियों को पानी मैं उबाल के नहाया !

फिर एक दिन दिखा मुझे एक अनोखा सा दृश्य,
छोटा सा घोंसला और दो चिड़ियाँ,
उन के तीन अंडे और चेह्चहाने की आवाज़ !
फिर क्या था मैने उन्हे रोज़ देखना ,
और इंतज़ार करना कब आएँगे चूज़े !

नींम थोड़ा बड़ा हुआ और चूज़े भी आए,
वो बड़े हुए और उड़ भी गये !
नींम मैं फिर सफेद सुंदर फूल आए,
और फिर छोटी छोटी निम्बोरियाँ !
अब तो मैं उसे रोज़ देखती और खुश होती,
कभी उस से बात करती कभी उस की डाल हिलाती !

देखते हे देखते नींम ताड़ सा हो गया !
दीवार में जैसे ही एक दिन दरार सी दिखी,
सब ने कहा नींम को कटवाओ !
बस मैं अकेली नींम के पक्ष में रह गयी !

क्या कुल्हाड़ी क्या दरांती नींम पर सब चली,
मेरी ज़िद में माँ ने नींम का ठूंठ भर रहने दिया !
अब वो कद मैं उतना ही था, जितना मैने पहली बार देखा था !
बस ना पत्तियाँ, ना शाखायें, ना फूल !
नींम था ,पर बस नींम सा ना रहा !

मानो एक सखी की विदाई आँगन सूना कर गयी !
कड़वे नींम की मीठी कुछ यादें ही रह गयीं !
मौसम बदला,गर्मी आई धूप अब कुछ तेज़ लगने लगी,
नींम की छाया की कमी सब को खलने लगी!

नींम के उस ठूंठ को देख देख मौसम यूँ ही बदल गये !
एक दिन सुबह सूखे से दिखने वाले ठूंठ पर,
अचानक मैने देखी दो नन्ही सी पत्तियाँ !
बसंत आया और नयी कोपलें,
नींम का वो जीवट पेड़ फिर हरा हुआ !
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